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पाकिस्तान की कूटनीतिक सक्रियता पर कांग्रेस का तंज, मोदी सरकार की विदेश नीति पर उठाए सवाल

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विदेश नीति पर कांग्रेस का हमला, जयराम रमेश बोले- पश्चिम एशिया संकट में भारत की भूमिका कमजोर दिखी

नई दिल्ली/आलम की खबर:पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच भारत की विदेश नीति को लेकर देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने बुधवार को केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की कूटनीतिक स्थिति कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। कांग्रेस ने खास तौर पर उस घटनाक्रम को मुद्दा बनाया, जिसमें पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता की मेजबानी की घोषणा की। विपक्ष का कहना है कि यह केवल एक सामान्य राजनयिक घटना नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया के बीच बन रहे नए समीकरणों का संकेत है, जिसे भारत नजरअंदाज नहीं कर सकता।

कांग्रेस ने इस पूरे मामले को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की “अत्यधिक व्यक्तिकेंद्रित विदेश नीति” की असफलता के रूप में पेश करने की कोशिश की है। पार्टी का कहना है कि भारत की विदेश नीति संस्थागत मजबूती, संतुलित रणनीति और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों पर आधारित होनी चाहिए, लेकिन मौजूदा दौर में इसे व्यक्तिगत छवि निर्माण और प्रतीकात्मक कूटनीति तक सीमित कर दिया गया है। इसी संदर्भ में कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने बयान जारी कर पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात और भारत की भूमिका पर कई गंभीर सवाल उठाए।

जयराम रमेश ने पश्चिम एशिया संकट को लेकर साधा निशाना

कांग्रेस महासचिव और पार्टी के संचार प्रभारी जयराम रमेश ने कहा कि पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बना तनाव सिर्फ क्षेत्रीय संकट नहीं है, बल्कि उसका असर वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और सामरिक संतुलन पर भी पड़ता है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे संवेदनशील समय में भारत की ओर से वह स्पष्ट और प्रभावशाली कूटनीतिक उपस्थिति नहीं दिखी, जिसकी अपेक्षा एक उभरती वैश्विक शक्ति से की जाती है।

रमेश ने कहा कि हालिया युद्धविराम के बाद जो कूटनीतिक हलचल तेज हुई है, उसने कई नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं। उनका तर्क था कि भारत लंबे समय से पश्चिम एशिया में संतुलित और बहुपक्षीय संबंधों की नीति अपनाता रहा है, लेकिन वर्तमान सरकार के दौर में उस संतुलन को नुकसान पहुंचा है। कांग्रेस का कहना है कि विदेश नीति में दिखावे से ज्यादा महत्व उस विश्वसनीयता का होता है, जो संकट के समय किसी देश की भूमिका से बनती है।

गाजा और वेस्ट बैंक पर चुप्पी को बनाया मुद्दा

कांग्रेस ने इस अवसर पर इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष को भी सरकार के खिलाफ राजनीतिक मुद्दे के रूप में उठाया। जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गाजा में इजरायल की सैन्य कार्रवाई और वेस्ट बैंक में बढ़ती गतिविधियों को लेकर सार्वजनिक रूप से स्पष्ट रुख नहीं अपनाया। कांग्रेस का कहना है कि भारत की ऐतिहासिक विदेश नीति हमेशा न्याय, शांति और संतुलित संवाद पर आधारित रही है, लेकिन मौजूदा सरकार इस प्रश्न पर असहज चुप्पी बनाए हुए है।

विपक्षी दलों का तर्क है कि भारत को न केवल अपने रणनीतिक हितों को साधना चाहिए, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नैतिकता और मानवीय संकटों पर भी स्पष्ट आवाज उठानी चाहिए। कांग्रेस ने संकेत दिया कि भारत की पारंपरिक “संतुलित पश्चिम एशिया नीति” अब दबाव और प्रतीकात्मक समीकरणों के बीच फंसती दिख रही है। यही वजह है कि विपक्ष इस पूरे मुद्दे को सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक छवि से जुड़ा प्रश्न बना रहा है।

‘विश्वगुरु’ वाली छवि पर कांग्रेस का कटाक्ष

जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में जिस तरह भारत की छवि को “विश्वगुरु” के रूप में प्रचारित किया गया, मौजूदा घटनाक्रम ने उस दावे की सीमाओं को उजागर कर दिया है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार ने विदेश नीति को अत्यधिक निजी छवि, व्यक्तिगत समीकरण और हाई-प्रोफाइल तस्वीरों तक सीमित कर दिया, जबकि जमीनी स्तर पर भारत का प्रभाव उन मंचों पर कमज़ोर दिखाई दे रहा है जहां वास्तविक संकट समाधान की जरूरत होती है।

कांग्रेस नेताओं का कहना है कि किसी भी देश की विदेश नीति केवल नेताओं की व्यक्तिगत मुलाकातों या प्रतीकात्मक आयोजनों से नहीं चलती, बल्कि उसके पीछे निरंतर रणनीतिक सोच, संस्थागत संवाद और अंतरराष्ट्रीय विश्वास होना चाहिए। विपक्ष इसी बिंदु को उभारते हुए सरकार पर यह आरोप लगा रहा है कि विदेश नीति को “इवेंट मैनेजमेंट” की तरह पेश किया गया, जबकि भू-राजनीतिक वास्तविकताएं कहीं ज्यादा जटिल हैं।

पाकिस्तान की भूमिका पर उठे नए सवाल

इस पूरे विवाद का सबसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील हिस्सा पाकिस्तान की कूटनीतिक सक्रियता को लेकर है। कांग्रेस ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को लेकर भारत लगातार पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घेरने की बात करता रहा है, लेकिन यदि वही पाकिस्तान अमेरिका और ईरान जैसे देशों के बीच संभावित संवाद की मेजबानी की स्थिति में दिखाई दे रहा है, तो यह भारत के लिए गंभीर रणनीतिक संकेत है।

विपक्ष का कहना है कि सरकार की ओर से बार-बार यह दावा किया गया कि पाकिस्तान को वैश्विक मंचों पर अलग-थलग कर दिया गया है, लेकिन वर्तमान घटनाक्रम इस दावे पर सवाल खड़े करता है। कांग्रेस ने यह भी संकेत दिया कि विदेश नीति में वास्तविक उपलब्धि और राजनीतिक प्रचार के बीच अंतर समझना जरूरी है। पार्टी के नेताओं ने कहा कि यदि कोई पड़ोसी देश एक तरफ आतंकवाद के आरोपों से घिरा हो और दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय संवाद का मंच भी हासिल कर ले, तो यह भारत के लिए चिंतन का विषय होना चाहिए।

मनमोहन सिंह काल से तुलना कर सरकार को घेरा

कांग्रेस ने मौजूदा सरकार की विदेश नीति की तुलना पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल से भी की। पार्टी का कहना है कि उस दौर में भारत ने कम शोर-शराबे लेकिन अधिक स्थिरता और गंभीरता के साथ वैश्विक मंचों पर अपनी भूमिका निभाई। कांग्रेस का यह भी दावा है कि भारत की साख तब संस्थागत मजबूती, आर्थिक विश्वसनीयता और संतुलित कूटनीति के कारण बनी थी, जबकि आज कई बार विदेश नीति का स्वरूप राजनीतिक ब्रांडिंग तक सीमित होता दिखाई देता है।

यह तुलना केवल राजनीतिक हमला नहीं, बल्कि उस बहस को फिर से जीवित करती है जिसमें यह सवाल उठता है कि क्या भारत की विदेश नीति को व्यक्तियों से ऊपर उठाकर संस्थानों और राष्ट्रीय दीर्घकालिक हितों के आधार पर संचालित किया जाना चाहिए। कांग्रेस इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए कह रही है कि विदेश नीति में निरंतरता और परिपक्वता सबसे बड़ा पूंजी होती है।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर भी कांग्रेस ने मांगा जवाब

विदेश नीति पर हमले के साथ-साथ कांग्रेस ने “ऑपरेशन सिंदूर” को लेकर भी सरकार को घेरने की कोशिश की। पार्टी का कहना है कि जिस अभियान को राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत किया गया, उसे अचानक रोकने या सीमित करने के फैसले पर सरकार ने देश के सामने स्पष्ट जानकारी नहीं रखी। विपक्ष का आरोप है कि सरकार बड़े सुरक्षा और सामरिक फैसलों को लेकर राजनीतिक संदेश तो देती है, लेकिन जब पारदर्शिता और जवाबदेही की बात आती है, तब स्थिति अस्पष्ट छोड़ दी जाती है।

कांग्रेस का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमा रणनीति और विदेश नीति जैसे विषयों पर सरकार को संसद और जनता दोनों के सामने स्पष्ट रुख रखना चाहिए। विपक्ष ने सवाल उठाया कि यदि किसी अभियान का उद्देश्य स्पष्ट था, तो उसके अचानक ठहराव या बदलाव के पीछे क्या कारण रहे, यह देश को बताया जाना चाहिए। हालांकि सरकार की ओर से इस पूरे हमले पर क्या औपचारिक प्रतिक्रिया आती है, इस पर अब राजनीतिक नजरें टिक गई हैं।

विपक्ष चाहता है स्पष्ट जवाब, सरकार पर बढ़ेगा दबाव

कुल मिलाकर कांग्रेस ने पश्चिम एशिया के तनाव, हालिया युद्धविराम, पाकिस्तान की कूटनीतिक सक्रियता और “ऑपरेशन सिंदूर” जैसे मुद्दों को जोड़कर केंद्र सरकार की विदेश नीति और रणनीतिक सोच पर बड़ा राजनीतिक हमला किया है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद, प्रेस कॉन्फ्रेंस और राजनीतिक सभाओं में और तेज हो सकता है, क्योंकि विपक्ष इसे “भारत की वैश्विक भूमिका बनाम राजनीतिक प्रचार” के फ्रेम में स्थापित करना चाहता है।

दूसरी ओर, भाजपा और केंद्र सरकार के समर्थक यह तर्क दे सकते हैं कि वैश्विक राजनीति बहुस्तरीय और जटिल होती है, और किसी एक घटनाक्रम के आधार पर विदेश नीति का आकलन करना जल्दबाजी होगी। लेकिन फिलहाल इतना साफ है कि कांग्रेस ने इस मुद्दे को केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे सीधे प्रधानमंत्री की कार्यशैली, कूटनीतिक दृष्टि और राष्ट्रीय छवि से जोड़कर बड़ा राजनीतिक विमर्श बना दिया है।

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